भीम प्रज्ञा काव्य कलशसृजन

डिंपल राठौड़ की कविताएँ

रचनाकार


मैं बहुत सारी बातें नहीं जानती
ये जरूरी तो नहीं मैं सब कुछ जानती होऊँ
मेरी बुद्धि, मेरा ज्ञान सीमित है
दुनिया अपरिमित

मुझे नहीं पता विश्व के कौन से कोने में
कौन-सा देश
अवस्थित है
कितने ही देश
कितनी ही राजधानियाँ
उनके झंडे उनकी संस्कृति
उनकी ताक़त
उनका प्रभाव
मैं नहीं जानती

मैं ठीक- ठीक नहीं बता सकती
देश के
पहाड़ों का नाप
नदियों का बहाव
मशीनों का शोर
या
अपने देश के सुदूर कोने में स्थित
एक छोटे गाँव का जीवन
वहाँ के लोग
उन्हें कैसे प्रभावित करती होगी दिल्ली
मैं नही जानती

मैं ठीक-ठीक नही जानती
जो ग़ैर- राजनीतिक है
वो कैसे प्रभावित है राजनीति से
रोज़मर्रा की चीज़ों के भाव
देश का इतिहास या
मानव का भूगोल
कैसे बदल सकती है राजनीति

मैं थार के समन्दर की रहवासी हूँ
रेत मेरी ज़िन्दगी का हिस्सा है
मेरा सफ़र रेत से पैदा होकर
रेत में मिल जाने तक का ही है

मैं बेख़बर हूँ
फूलों की पैदाइश से
इसीलिए आप से जानना चाहती हूँ
कि कमल खिलने के लिए
कीचड़ अनिवार्य शर्त है क्या?

मैं नहीं जानती
धन के अर्जन-व्यय का गणित
सम्पत्ति का स्वामित्व
बच्चों का भविष्य

आप समझ ही सकते हैं कि
चूल्हे चौके से इत्तर
मैं बहुत सारी बातें नहीं जानती

॰॰॰

२.
उतनी ही नहीं हूँ मैं

मैं उतनी ही नहीं हूँ
जितना तुम
मुझे जानते हो

चन्द्रमा के ना दिखने वाले
हिस्से की तरह
आधी मैं भी अदृश्य हूँ
हवाओ के साथ बहती हूँ
रोशनी के हर क़तरे में घुलती हूँ
पेड़ों से गिरे पत्तों की तरह बीतती हूँ
फिर लौट आती हूँ
नये पल्लवों में

अंधेरे में घुलती हूँ

मैं उतनी ही नहीं हूँ
जितना तुम
मुझे जानते हो
मुझमें मेरा बहुत कुछ है
जो बिन जाना
बिन कहा
बिन समझा ही रह जायेगा
जीवन रेत ज्यूँ बह जायेगा
॰॰॰

३.
मेरा कोई दिन

नीम बेहोशी में
खोई रहती हूँ
सोई रहती हूँ

देखती हूँ रोज़ एक स्वप्न
ये दुनिया तबाह हो रही है
समन्दर ने ले लिया है विकराल रूप
पूरा संसार जलमग्न हो रहा है

मेरा परिवार मुझे ढूँढ रहा है
मै किसी ऐसी जगह गुम हूँ
खुद को चट्टानों के बीच
जल की गहराई में पाती हूँ
ताजुब्ब ये कि मुझे तैरना नहीं आता
पर मैं ही बचा रही हूँ सृष्टि

जाने कैसे कौतूहल में उलझी रहती हूँ
कभी समंदर, कभी झरने, कभी दूर तलक फैला रेगिस्तान
वेवजह सपनों में भटकती हूँ
ये सब मुझे क्या कहना चाहते है?

मुझे मरने से डर लगता है
बहुत ख्वाहिशें अधूरी है अभी
यही उलझन मेरे जीवन को
उलझा रही है

वो क्या है जिसने मुझे लड़ने का साहस दिया
वो कौनसी शक्ति है,
जिसने मुझे कभी हारने नहीं दिया
जवाब सिर्फ एक है इच्छाशक्ति

अगर मुझे जीना है तो लड़ना है जीवनभर
एक स्त्री के जीवन में कितने ही कष्ट हो
उसे जीना है
उसे जीतना है
चट्टाने, समन्दर, रेगिस्तान
सब है उसके भीतर
जिसे किसी स्वप्न सदृश दृश्यों में
वो रोज़ पार करती है

॰॰॰
५.
क्या-क्या होती हैं औरतें

औरतों के देह में होती है एक अलग गंध
जिससे महकता है पुरुष
औरत की देह में होता है पसीना
जिससे झुंझला जाता है पुरुष…

औरतों की देह में होता है आकर्षण
जिसमे खोये रहना चाहता है पुरुष
औरत की देह में होती है थकान
जिससे ऊब जाता है पुरुष

औरतों की देह में खोजता है वासना की ज्वाला
जिसमे जल जाना चाहता है पुरुष
औरत की देह में होती है चूल्हे की आग
जिससे तप जाता है पुरुष..

औरतों से होती है औरत
औरतों को जानती है औरत
औरतों को देखती है औरत
औरतों पर जुझलती है औरत

औरत देखती है औरतों के पास पुरुष
औरत हर लम्हा देखती है कहीं
औरतों की ही तरह

हर रात महकती है,
गमकती है,
इठलाती है औरत..

औरत सुबह की पहली किरण से ही
औरत से औरत बन जाती है

क्या कमाल की होती है औरत
बेमिसाल होती है औरत
एक पुरूष की नज़र में
एक औरत की नज़र में
क्या-क्या होती है औरत
॰॰॰

६.
जूती

तुम्हारे लिए मै अपना घर छोड़ आईं
एक पूरी दुनिया जो हक़ीक़त थी मेरी

तुमने लगा दी मुझ पर पाबंदी
घर की चौखट को
बना दी मेरी दुनिया

तुमने ही तय किया
कि मुझे
क्या पहनना है
क्या खाना है
कब और क्या बोलना है
कैसे बोलना है
होंठों को कितना खोलना है
कब तलक बोलना है….!!

खींची गई दीवारें मेरी दहलीज पर
बताया गया मुझे बाहर कोई दुनिया नहीं तुम्हारी

समझाएं गए मुझे रहने के सलीक़े
बताया गया मुझे मर्यादा में रहना

बताया गया मुझे तुम्हारी दिन रात सेवा
तुम्हारी खुशी को पूरी करना
मेरा कर्म, मेरा धर्म है

मैंने सब किया सिर्फ तुम्हारे लिए
मैंने सब सहा तुम्हारे लिए
अपने वजूद को विगलित किया
सब सहा
फिर भी तुमने मुझे सदा
पैर की जूती ही कहा।।

डिंपल राठौड़

 

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