सृजन

इसीलिए मारे जाते हैं शंबुक

कविता : शिव बोधि

इसलिये काटे जाते है अँगूठे
शास्त्र थोपे जाएँ, वीर उगे ना।

इसीलिए मारे जाते हैं शम्बुक
रैदास पैदा न हो, कबीर उगे ना।

तभी वो बच्चा बाप से कहता था
बंदूके बो दो गर ज़मीर उगे ना |

वो मुझे छाँटकर अलग कर देंगे
मेरे माथे पर जो अबीर उगे ना |

रोने से फ़कत बुज़दिली आती है
कलमें उठाओ जो पीर उगे ना |

इसीलिए उसे तुम खुदा कहते हो
उसकी इंकलाबी नज़ीर उगे ना |

उलझा दो मज़हब के सवालों में
मुल्क में मुद्दा गम्भीर उगे ना |

सत्ता को इश्क से बड़ा खतरा है
कानूनन राँझा कि हीर उगे ना|

वास्ते जम्हूरियत ख़्याल रखना
तुम चुन लेना वज़ीर उगे ना |

ये धरती तेरी, मेरी, सबकी है
‘बोधि’ इस पर लकीर उगे ना |

शिव बोधि

Show More

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
Close